Friday, October 26, 2012

जीवन पर अब गुरूर है !

मंजिल भले एक स्वप्न हो, 
पथ पर चलना अनंत हो  
रास्ता मगर ये सत्य है  
मंजिल मिले न मिले
पदचिंह तेरे, पैरो में छाले ये, एक तथ्य है 
रुकना नहीं, चलना तेरा कर्तव्य है 
जानता हूँ, के थक के हुआ तू चूर है 
पर मंजिल नहीं, ये पसीना अब गुरूर है ।

विजय भले एक स्वप्न हो 
शत्रु चाहे अनंत हो 
तू लड़ा मगर ये सत्य है 
विजय मिले न मिले 
कटे अंग, लहू से लथपथ बदन, एक तथ्य है 
आराम  नहीं, लड़ना तेरा कर्तव्य है 
जानता हूँ, विजय के लिए तू शुरुर है 
पर विजय नहीं, कटा जो सर तो गुरूर है ।

सुख भले एक स्वप्न हो 
कठिनाई चाहे अनंत हो 
तू जिया मगर ये सत्य है 
सुख मिले न मिले 
दुःख तूने जो झेले, सच तूने जो बोले, एक तथ्य है  
मरना नहीं, जीना तेरा कर्तव्य है
जानता हूँ, दुःख से तू मजबूर है 
पर सुख  नहीं, जीवन पर अब गुरूर है ।

Sunday, October 21, 2012

आजकल

एक ज्वालामुखी हम अपने अन्दर लिए फिरते हैं  
यूँ तो हर गली हर सड़क आजकल बम फटते हैं ।

यूँ तो आँखों में शोले और जुबां पे ज़हर रखते हैं 
बस दिल के दरवाजे आजकल हम बंद रखते हैं । 

Thursday, October 18, 2012

मेरी वोह comics की दुकान

पकते थे जहाँ बातो के पकवान 
बंटता था जहाँ मुफ्त का ज्ञान 
शाम होते ही आ जाते थे 
मेरे दोस्त शैतान 
थी मेरी वोह comics की दुकान |

दुनिया भर की मुश्किलों से अनजान
नागराज, ध्रुव, डोगा, चाचा, पिंकी  
से थी अपनी जम के पहचान
नाग और dogs को दिया कहीं सम्मान 

थी मेरी वोह comics की दुकान | 

एक comic का किराया था 
पचहत्तर पैसा नादान 
मिलते ही उसके 
चेहरे पे खिल जाती थी जहाँ मुस्कान
थी मेरी वोह comics की दुकान | 

समय तो ऐसे दोड़ गया, जैसे 
चली हो राजधानी मस्तान  
पीछे छुट गए वो सब मैदान 
याद आती है अब बहुत उसकी 
थी मेरी वोह comics की दुकान | 

Wednesday, October 17, 2012

अंत अभी बाकी है !

सर्पो ने फन खोला ही है, डसना अभी बाकी है
ये कंठ सूखे नहीं, सीलन इनकी बाकी है ।

बादल तो बरसे ही हैं, गर्जना अभी बाकी है
गुडिया की गुडिया में चाभी थोड़ी बाकी है ।

प्रेम रस को ही है सुना, वीर रस अभी बाकी है
धरती ही तो जीती है, आसमां अभी बाकी है ।

पर्वत सिर्फ पिघले हैं, उफनना अभी बाकी है
 ये तो शुरुआत है, अंत अभी बाकी है ।




Tuesday, October 16, 2012

Change...

सूरज कब तक जले, अब बुझना ही होगा 
तुझे ठहर के, अब सम्भलना ही होगा ।

नदी कब तक बहे, अब रुकना ही होगा  
तुझे इस खुमार से निकलना ही होगा ।

वृक्ष कब तक रहें खड़े, अब गिरना ही होगा 
तुझे स्वप्न-लोक से निकलना ही होगा ।

शिव कब तक विष पिए, अमृत अब पीना ही होगा
तू लाख मरना चाहे, पर अब जीना ही होगा ।  

मर्द !

धरती कब तक ये बोझ सहे, हिलना ही होगा 
सीता क्यूँ चुप-बदनाम रहे, कुछ कहना ही होगा  
द्रोपदी क्यूँ पांच में बटें, खुद से निश्चय करना ही होगा 
राम-कृष्ण के सामने जो हुआ, कलयुग में दोहराना नहीं होगा 
सदियों से बंद इन कपाटो को अब खुलना ही होगा
मेरे साथ शोलो पे अब तुझे भी चलना होगा
मुझे पाना है, मर्द, तो तुझे बदलना ही होगा ।

आदर्शवादी जीवन का ये खोखला चक्कर
खुद को बनाया देवता तूने हर सदी 
तेरे लिए कुर्बान हुयी सीता-द्रोपदी
पर मैं तो हूँ दुर्गा,काली,लक्ष्मी और सरस्वती
कैसे तू भुला इसको हर घडी
तुझे राम-अर्जुन के आदर्शो को भूलना ही होगा
मुझे पाना है, मर्द, तो तुझे बदलना ही होगा ।

रीति-रिवाजो की जंजीरों में बंधकर 

तेरे चरणों की धूल तक मांग में भरी
हर दम तेरे पीछे मैं चली, 
पर मैं ही तो तेरे लिए यम तक से लड़ी
कैसे तू भुला इसको हर घडी
तुझे अब इन जंजीरों को तोडना ही होगा
मुझे पाना है, मर्द, तो तुझे बदलना ही होगा ।

तेरी कल्पना का विषय बनकर
मैं परियो से सुन्दर, सितारों में बसी
तूने चाँद भी तोड़े, मेरे होठ गुलाबो की पंखुड़ी
पर मैं तो खुद ही अन्तरिक्ष तक उडी
कैसे तू भुला इसको हर घडी
तुझे इन उपमायो से अब निकलना ही होगा
मुझे पाना है, मर्द, तो तुझे बदलना ही होगा ।

Monday, October 15, 2012

फिदरत !

मौसम बदलते हैं, रुख हवाओ के बदलते, है बहाव नदी बदल सकती
कमरे में ये "महावीर" की जो आज मूर्ति लगा दी, अब हट नहीं सकती ।

कवि बदलते हैं, हैं बदलते लेखक, ये कलम है बदल सकती
पर मेरे-तेरे बीच ये दीवार जो लगा दी, अब गिर नहीं सकती ।

ग्रह बदलते हैं, बदल जाते नक्षत्र, हैं आकाश-गंगाएं बदल सकती
पर "गीता" के नाम पे ये आग जो जला दी, अब बुझ नहीं सकती ।
 

देश बदलते हैं, बदलते संगी-साथी, है भाषा बदल सकती 
"संस्कृति" का ढोंग करती सोच ये पथरो-सी, अब पिघल नहीं सकती ।

रंग बदलते हैं, हैं जुंबा के ढंग बदलते, हैं तेज नज़र बदल सकती   
पर फिदरत "यूँ ही" ने जो बना ली, अब बदल नहीं सकती ।




Sunday, October 14, 2012

सुन्दरता !

सुन्दरता ! प्रभु का दिया गया वरदान
है क्या तुम्हारा योगदान ?
करो मत इस पर तुम अभिमान 
क्यूंकि, इसको छीनेगा भगवान् ।

है नहीं ये तुम्हारी सम्पदा 
उस ने दिया, तुमको यह उपहार 
करो न इसको यूँ बेकार 
करो इसका, आदर व श्रृंगार ।

ठहरे रहो न, लेके अब यह उपहार
जाओ जाके घिसो-तपो तुम 
कोयला भी हो जाए सोना 
जायो करो कुछ ऐसा चमत्कार । 

याद रखे कौन, क्या लाये तुम 
गीत पर गवें उसी के बाधो-श्रावण 
सृष्टी ने देखा जिसको  
करते हुए खुद का नव निर्माण ।

खुद को कर लो ऐसे तैयार 
यम को भी आये शर्म 
जब आये वोह लेने 
तुमसे तुम्हारा ये उपहार ।

Saturday, October 13, 2012

काम का पूरा दाम दो !

माशपेशियो में ताकत इतनी
पत्थर पिघला सकता हूँ,
है ढ्रडशक्ति इतनी, की
नदी पे बांध लगा सकता हूँ,
मुझमे शर्म नहीं है रत्ती
मल-मूत्र उठा सकता हूँ,
साहस की भी कमी नहीं,
सर तक कटा सकता हूँ ।

काम ही से मेरा मान है
यह मेरा स्वाभिमान है
है काम नहीं कोई भी नीचा
काम से हो, यह सर पर्वत से ऊँचा
तुम मुझको मत एहसान दो
हेयद्रष्टि भी मत तान दो
देना हो तो काम दो
काम का पूरा दाम दो ।







मंजिल को पा !

लहू रगों में है जो तेरी
उसको तू तेज़ाब बना ।

साँसें तेरी जो चलती हैं
उससे तू आंधी को ला ।

कदमो की आहट से तेरी
भूकंप भी अब मुश्किल न हो ।

हुंकार तेरी अब ऐसी हो
सिंह गर्जना जैसी हो ।

आग तेरे है जो दिल में
उससे खुद को और तपा।

बारिश की बूंदों से तू
शीतल बिलकुल मत हो जा ।

हरियाले उपवन को देख
ख्याल किसी के मत खो जा ।

कोयल की मधुर ध्वनि को सुन
इस रस्ते में तू मत सो जा ।

बाँध कल्पना को अपनी

ख्वाबो से खुश मत हो जा ।

सुनहरे पवन के स्पर्श से

एक कवि तू मत हो जा ।

बातो बातो में आज तू
एक दार्शनिक मत हो जा ।

निगाह तेरी मंजिल पर हो
रास्ते-संगियो मत खो जा ।